........ देर रात को सोने व थकावट के बाद सुबह उठने का मन नहीं कर रहा था। पर उठना पड़ा क्योकि भट्टा गांव जो जाना था। पता नहीं वहां रात भर क्या-क्या हुआ होगा । इस तरह के बार - बार एक ही सवाल मन में घुम रहा था। वहां जल्द से जल्द पहुंच कर देखा जाये कि रात में क्या-क्या हुआ। मैने संदीप को फोन लगाया और जल्द ही तैयार होने को कहा। संदीप देर न करते हुए कहा आप आ जाओ मै तैयार होता हूं। मैं जल्दी-जल्दी तैयार हो कर संदीप के यहां पहुंचा जहां वो पहले से तैयार था। उसे लेकर मैं भट्टा पारसौल के लिए निकल गया। मन में एक ही सवाल बार बार उठ रहा था वो ये कि ना जाने रात में क्या-क्या वहां हुआ होगा। क्या पुलिस हमें वहां जाने देंगी, अगर जाने देंगी तो गांव वाले हमारे साथ क्या करेंगे। ऐसे अनेको सवाल था। पर हम लोग आगे बढ़ते रहे और पहुंच गये भट्टा....भट्टा गांव के जाने वाले रास्ते पर ही पुलिस बल के जवान तैनात थे। गांव में किसी को जाने नहीं दिया जा रहा था। सभी मीडिया वाले वहीं एंट्री प्वाइंट पर खड़े हो कर इंतजार कर रहे थे कि कहीं से कुछ मिल जाए। लेकिन ऐसा उम्मीद नहीं थी कही से कुछ मिल पाता। ना कोई कुछ पुलिस वाले बोलने को तैयार थे ना कोई और । अगर कहीं से मौका मिल जाये तो गांव के अंदर जाया जाये, लेकिन वहां जाना असंभव लग रहा था। तभी मेरे दिमाग में एक आइडिया आया जो मैने इंटरमीडियट में पढ़ा था। फिर क्या था मैने संदीप से वो बातें बताई संदीप उछल पड़ा कहा यार ये आइडिया तो अच्छा है पर इसमें रिस्क बहुत है । मैने कहा रिस्क किस काम में नहीं है चलो देखते हैं। मैने अपने साथ एक दो मीडिया वालो से बात की तो वो तैयार हो गये। और फिर हम चल दिये। जहां हम लोग खड़े थे वहां से चार- पांच किलो मीटर खेतो के तरफ बढ़े फिर वहां से गांव के सिध में होते हुए लौटने लगे , यानी की गांवो में जाने लगे । गांव के अंदर तो चले गये, लेकिन वहां जो हमने देखा। वह देख कर हमारा रूह कांप गया। जमीन पर पड़े खून के धब्बे , जले हुए नई- नई गाड़िया, टूटे हुए टीवी फ्रिज, पंखा, चूल्हा ये बंया कर रहे थे की उन पर कितना जुल्म हुआ था। उनके खेतों में रखे गेंहूं के ढ़ेरो में आग लगा दिया गया था जले पड़े थ्रेसर और अनाज । इन सब से यही पता चलता था कि किस तरह से इनके साथ जुल्म हुआ होगा। छोटे- छोटे बच्चों को भी पीटा गया था। पुलिस वालो ने लड़कियों को भी इतना लात और घूसों से पीटा था की उनके हाथ तक टूट गयी थी । उन्हें कोई अस्पताल ले जाने वाला नहीं था। गांव में एक भी पुरूष नहीं था सब जान बचा कर कहीं भाग गये थे। हम लोगों के वे लोग अपनी आप बीती सुन रहें थे, गांव की महिलायें रो-रो कर अपनी बात बता रही थी। उनको डर था कि उनके घर वाले को पुलिस ने मार दिया है, जिंदा जला दिये गयें है । वो लोग हम लोगो से ये कह रहे थे कि हमारे घर वालो के बारे में कुछ बता तो दो। कुछ भी उनके बारे में पता चले तो हमें जरूर बताओ। तभी गांव में मीडिया वालो की होने की खबर पुलिस वालो के ऑफिसरो को लगी, तो उनके हाथ-पांव फुलने लगे। तभी हमें पांच- सात पुलिस की गाड़िया आती दिखाई दी। घर से निकले औरते घरों में घुसने लगी घरों की दरवाजे बंद करने लगी। हमें कुछ समझ में नहीं आ रहा था , लेकिन गांव वालो में वो शायद पुलिस का खौफ था । इस लिए वे लोग दरवाजे बंद कर रहे थे। तभी हमारे पास एसीपी मोनी पांडे की गाड़ी आ कर रूकी । रूकते ही हम लोगो पर डंडा भांजने लगी । और कह रही थी इतना गस्त होने के बावजूद तुम लोग अंदर कैसे आ गये। जल्दी भागो नहीं तो कैमरा तोड़ दूंगी। हम लोग भी वहां से चलना ही ठीक समझा। जब हम लग वहां निकल रहे थे तो क्या देखा लोगो के घरों पर पुलिस ने अपना कब्जा जमा लिया है। जिनके घर है उनहें घर से भगा दिया गया है, लोग पुलिस के खौफ से अपना घर छोड़ कर दुसरे के घर में शरण लिये है। हम लोग वहां से निकल आये हमें उस दिन का मेटेरियल मिल गया था। सो वहां रूकना अब ठिक नहीं समझा। मैने संदीप से कहा चलते है अब, उसने भी हामी भरी और हम लोग वहां से चल दिये। कल सुबह मेरी मेहनत मेरे अखबार में दिखी। मेरे एडिटर साहब ने मुझे बुला कर शाबाशी दी और कहा ऐसे ही करो तुम बहुत आगे तक जाओगे। और मेरा पेमेंट दुगना कर दिया। मैं बहुत खुश था । और खुश भी क्यों ना होऊ पूरे ऑफिस में मेरे ही चर्चे हो रहे थे । इस बार भी बहुत लंबा हो गया यह लेख और भी बहुत कुछ है आपसे शेयर करने के लिए सो अगले अंक में...
aapka lekh to bilkul film ki kahani lagta hy, par ye sacchai hy
जवाब देंहटाएंpta nahi hm ye kis tarah k loktantr me jee rahe hy
bhatta parsaul v kuch dino k liye charcha me to raha pr aaj wahan kya ho raha hy iski koe khoj khabar lene wala nahi hy
media ko v shayad ab usme dilchaspi nahi rahi
aapne jo kiya wo wakey me kafi sahasi hy
media ko aap jaise logon ki hi jarurat hy
अमित जी सबसे पहले आपको धन्यवाद...ये फिल्म की कहानी नहीं दोस्त ये एक हकिकत है. ये बात अलग है कि दुसरे राज्य में भले ही ये चर्चा में नहीं हो लेकिन भट्टा-पारसौल आज भी नोयडा के मीडिया में है. इससे जुड़े लेख छप रहे है.
जवाब देंहटाएंमै ऐसा नही कहना चाह्ता था
जवाब देंहटाएंकहानी फ़िल्म की नही है
फ़िल्मो मे ऐसा होता है
विजय जी ब्लोग की दुनिया मे आपका स्वागत है. अमित की कुछ बातों से मै सहमत हूं. भट्टा पर्सौल का मुद्दा मीडिया मे जितना जल्दी गरमाया उतनी जल्दी ठन्डा भी पड गया. हमारा मकसद केवल समाचार जुटाना ही नहीं बल्कि सकारात्मक पत्रकारिता भी होनी चाहिये. लिखते रहें. धन्यवाद.
जवाब देंहटाएंशुक्रिया सुनीता जी. भट्टा पारसौल आज भी मीडिया में है.ये अलग बात है कि टीवी में नहीं है. लेकिन अखबार में जरूर आपको पढ़ने को मिल जायेगा. हम आज भी उस गांव के समस्याओ के बारे में लिख रहें हैं.
जवाब देंहटाएंWell done Vijay you did a good job.
जवाब देंहटाएंIts a pity that our saviors are not doing their real job. It's really a cruel n disgusting act.